देश में खरीफ फसलों की बुआई का कुल रकबा पिछले साल की तुलना में भले ही कम है, लेकिन अंतर लगातार घट रहा है। कृषि मंत्रालय की ओर से मंगलवार को जारी आंकड़ों के मुताबिक, 7 अगस्त तक खरीफ फसलों की बुआई का कुल रकबा 967.92 लाख हेक्टेयर रहा। पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा 985.89 लाख हेक्टेयर था। इस तरह इस साल खरीफ फसलों के कुल रकबे में करीब 1.82 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है।
हालांकि, खरीफ सीजन की प्रमुख फसल धान की बुआई अब भी पिछले साल की तुलना में पीछे चल रही है। आंकड़ों के अनुसार, 7 अगस्त तक धान की बुआई 344.78 लाख हेक्टेयर में हुई है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में 360.67 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में धान की बुआई हो चुकी थी। इस लिहाज से धान का रकबा पिछले साल की तुलना में 4.40 प्रतिशत कम है।
खरीफ फसलों की बुआई आम तौर पर दक्षिण-पश्चिम मानसून की स्थिति पर निर्भर करती है। देश के अधिकांश हिस्सों में किसान बारिश के आधार पर धान, दालें, मोटे अनाज और अन्य खरीफ फसलों की बुआई करते हैं। मानसून की स्थिति और खेतों में नमी के आधार पर बुआई की गति अलग-अलग क्षेत्रों में बदलती रहती है। ऐसे में सीजन आगे बढ़ने के साथ बुआई के रकबे में बदलाव की संभावना बनी रहती है। कुल रकबे में मामूली सुधार कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले साल की तुलना में इस वर्ष खरीफ फसलों के कुल रकबे में कमी जरूर है, लेकिन अंतर कम हुआ है। 7 अगस्त तक कुल रकबा 967.92 लाख हेक्टेयर दर्ज किया गया। पिछले साल यह 985.89 लाख हेक्टेयर था। इस तरह करीब 17.97 लाख हेक्टेयर का अंतर रह गया है।
कृषि क्षेत्र के लिए खरीफ सीजन बेहद महत्वपूर्ण होता है। देश की बड़ी आबादी की आजीविका कृषि पर निर्भर है और खरीफ उत्पादन का असर खाद्य आपूर्ति, किसानों की आय तथा कृषि आधारित अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। ऐसे में बुआई के रकबे पर कृषि मंत्रालय की लगातार नजर रहती है। धान की बुआई 4.40 प्रतिशत पीछे धान खरीफ सीजन की प्रमुख फसल है। देश के कई राज्यों में धान की खेती मानसूनी बारिश पर निर्भर रहती है। इस साल 7 अगस्त तक धान की बुआई 344.78 लाख हेक्टेयर में हुई है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में 360.67 लाख हेक्टेयर में धान बोया गया था।
इस तरह धान के रकबे में 15.89 लाख हेक्टेयर की कमी है। प्रतिशत के लिहाज से यह कमी 4.40 प्रतिशत है। धान की बुआई में कमी को खरीफ सीजन के कुल आंकड़ों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि धान का कुल खरीफ क्षेत्र में बड़ा हिस्सा है। आने वाले दिनों में जिन क्षेत्रों में पर्याप्त बारिश होती है, वहां धान की बुआई का रकबा बढ़ सकता है। हालांकि, बुआई की समयसीमा और क्षेत्रीय मौसम परिस्थितियां अंतिम रकबे पर असर डालेंगी।
दालों की बुआई भी कम दालों के मामले में भी पिछले साल की तुलना में रकबा कम दर्ज किया गया है। 7 अगस्त तक देश में दालों की बुआई 103.78 लाख हेक्टेयर में हुई, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में 105.73 लाख हेक्टेयर में दालें बोई गई थीं। इस तरह दालों के रकबे में करीब 1.95 लाख हेक्टेयर की कमी है। दालें देश की खाद्य सुरक्षा के साथ-साथ किसानों की आय के लिए भी महत्वपूर्ण फसल मानी जाती हैं। अरहर, मूंग, उड़द जैसी कई प्रमुख दालों की खेती खरीफ मौसम में होती है। दालों के उत्पादन में बदलाव का असर बाजार में उपलब्धता और कीमतों पर भी पड़ सकता है। इसलिए सरकार खरीफ सीजन में दालों की बुआई और उत्पादन पर विशेष ध्यान देती है। मोटे अनाज का क्षेत्र भी घटा मोटे अनाज की बुआई भी पिछले वर्ष की तुलना में कम रही है। मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 7 अगस्त तक मोटे अनाज का रकबा 168.50 लाख हेक्टेयर दर्ज किया गया। पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 173.21 लाख हेक्टेयर था। इस तरह मोटे अनाज की बुआई में करीब 4.71 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई। मोटे अनाज में बाजरा, ज्वार, मक्का सहित कई फसलें शामिल हैं। इन फसलों को कम पानी वाले क्षेत्रों में भी उगाया जाता है और बदलते मौसम के दौर में इनका महत्व लगातार बढ़ रहा है। आगे बढ़ सकता है बुआई का रकबा खरीफ फसलों की बुआई का सीजन अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। ऐसे में आने वाले दिनों में बुआई के आंकड़ों में बदलाव संभव है। जिन राज्यों में बारिश देर से हुई है, वहां किसान आगे भी बुआई कर सकते हैं। मौसम की स्थिति खरीफ फसलों के लिए निर्णायक होगी। पर्याप्त और सामान्य रूप से वितरित बारिश होने पर बुआई के रकबे में सुधार की संभावना रहेगी। वहीं अत्यधिक बारिश या लंबे समय तक बारिश की कमी होने पर किसानों को नुकसान उठाना पड़ सकता है। कृषि मंत्रालय के ताजा आंकड़े बताते हैं कि खरीफ फसलों के कुल रकबे में पिछले वर्ष की तुलना में कमी जरूर है, लेकिन यह अंतर घटकर 1.82 प्रतिशत रह गया है। इसके बावजूद धान, दालों और मोटे अनाज की बुआई पिछले साल की समान अवधि से पीछे है। अब किसानों और सरकार की निगाहें मानसून के अगले दौर और शेष बुआई पर टिकी हैं। आने वाले सप्ताहों में बुआई की गति से यह तय होगा कि इस साल खरीफ फसलों का अंतिम रकबा किस स्तर पर पहुंचता है।

















