राजस्थान अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, ऐतिहासिक धरोहरों और अनूठे खान-पान के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। राजस्थानी थाली का स्वाद चखने वाले लोग यहाँ के पारंपरिक व्यंजनों के मुरीद हो जाते हैं। इन्हीं व्यंजनों में सबसे खास और चर्चित नाम है मारवाड़ की प्रसिद्ध 'केर सांगरी' की सब्जी। कभी भीषण अकाल और पानी की भारी किल्लत के दौरान अस्तित्व में आई यह रेगिस्तानी सब्जी आज बड़े-बड़े होटलों और शाही थालियों की शान बन चुकी है। बाजार में इसके दाम काजू और बादाम को भी टक्कर दे रहे हैं और यह लगभग 1000 रुपये प्रति किलोग्राम या उससे भी अधिक भाव में बिक रही है।
अकाल और सूखे के दौर से निकला स्वाद
राजस्थान, विशेषकर पश्चिमी मारवाड़ क्षेत्र में कड़ाके की धूप और पानी की कमी हमेशा से एक बड़ी चुनौती रही है। इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि जब सदियों पहले इस इलाके में भयंकर सूखा पड़ा करता था, तब हरी सब्जियों की पैदावार पूरी तरह ठप हो जाती थी। ऐसी विषम परिस्थितियों में रेगिस्तान में रहने वाले लोगों ने भूख मिटाने के लिए प्रकृति के सहारा लिया। उन्होंने सूखे के बीच भी जीवित रहने वाले कंटीले पौधों और पेड़ों की फलियों का उपयोग करना शुरू किया। इसी संघर्ष और सूझबूझ से 'केर सांगरी' की उत्पत्ति हुई, जिसने न केवल उस दौर में लोगों की भूख मिटाई बल्कि आगे चलकर राजस्थान के खान-पान का मुख्य हिस्सा बन गई।
क्या है केर और सांगरी?
केर सांगरी किसी आम खेत में उगाई जाने वाली सब्जी नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह से प्राकृतिक रूप से उगने वाली जड़ी-बूटी और फलियों का मिश्रण है:
केर: यह छोटे गोल आकार की खट्टी-मीठी जंगली बेरी होती है, जो रेगिस्तान के कंटीले और झाड़ीनुमा पौधों पर उगती है।
सांगरी: यह राजस्थान के प्रांतीय वृक्ष 'खेजड़ी' पर उगने वाली पतली और लंबी फलियां होती हैं। कड़कती धूप और बिना पानी के भी ये पौधे फलते-फूलते हैं। इन्हें तोड़कर धूप में सुखा लिया जाता है, जिससे इन्हें सालों-साल बिना खराब हुए स्टोर करके रखा जा सकता है।

















