वन एवं सहकारिता मंत्री केदार कश्यप ने पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल द्वारा सोशल मीडिया पर पुलिस अधिकारियों और भाजपा जनप्रतिनिधियों को लेकर दिए गए बयान की कड़ी आलोचना करते हुए उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में राजनीतिक मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन पुलिस प्रशासन और संवैधानिक व्यवस्था को खुले तौर पर धमकी देना लोकतांत्रिक मर्यादाओं के खिलाफ है। केदार कश्यप ने कहा कि भूपेश बघेल का यह कथन कि पुलिस अधिकारी ध्यान रखें, भाजपा कुछ ही महीनों की मेहमान है, फिर मिलेंगे पुलिस प्रशासन को दबाव में लेने का प्रयास है। उन्होंने कहा कि इस तरह की भाषा लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है और कांग्रेस की राजनीतिक संस्कृति को दर्शाती है।
वन मंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ अब भय और राजनीतिक दबाव की संस्कृति से बाहर निकल चुका है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में प्रदेश में कानून का राज स्थापित है और पुलिस निष्पक्षता के साथ अपना दायित्व निभा रही है। ऐसे में पुलिस अधिकारियों को भविष्य की राजनीतिक सत्ता का हवाला देकर चेतावनी देना दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस के शासन काल में अपराध, भ्रष्टाचार और राजनीतिक संरक्षण के कारण जनता का विश्वास कमजोर हुआ, जिसका परिणाम चुनाव में कांग्रेस की हार के रूप में सामने आया। जनता ने भाजपा को जनादेश देकर सुशासन और कानून के राज के पक्ष में अपना विश्वास जताया है।
केदार कश्यप ने कहा कि जब कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा कानून-व्यवस्था प्रभावित करने या प्रदर्शन के दौरान नियमों का उल्लंघन करने पर पुलिस कार्रवाई करती है, तब कांग्रेस के नेता पुलिस पर दबाव बनाने लगते हैं। उन्होंने कहा कि विपक्ष की भूमिका लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने की होनी चाहिए, न कि पुलिस और संवैधानिक संस्थाओं को धमकाने की। उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति को कानून का पालन करना होगा और किसी भी व्यक्ति को उसके राजनीतिक पद या दल के आधार पर कानून से ऊपर नहीं माना जाएगा। पुलिस अपना काम निष्पक्षता और संवैधानिक दायित्वों के अनुरूप करती रहेगी। केदार कश्यप ने कहा कि लोकतंत्र में असहमति और आलोचना का अधिकार सभी को है, लेकिन धमकी, भय और दबाव की राजनीति का कोई स्थान नहीं है। उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री से अपनी भाषा और आचरण की गरिमा बनाए रखने की अपील करते हुए कहा कि जनता अब शांति, सुशासन और कानून का राज चाहती है।
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश की धमकी भरी भाषा राजनीतिक हताशा का प्रमाण : केदार कश्यप













