विदेश मंत्रालय में राजनयिक फेरबदल, अजय कुमार इराक में और सौमेंदु बागची स्विट्जरलैंड में अगले राजदूत


देश 18 August 2026
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विदेश मंत्रालय में राजनयिक फेरबदल, अजय कुमार इराक में और सौमेंदु बागची स्विट्जरलैंड में अगले राजदूत

विदेश मंत्रालय में बड़े स्तर पर राजनयिक फेरबदल करते हुए केंद्र सरकार ने इराक और स्विट्जरलैंड में भारत के अगले राजदूतों की नियुक्ति की घोषणा की है। विदेश मंत्रालय द्वारा जारी बयान के अनुसार 2001 बैच के भारतीय विदेश सेवा अधिकारी अजय ए. कुमार को इराक गणराज्य में भारत का अगला राजदूत नियुक्त किया गया है।

अजय ए कुमार अभी विदेश मंत्रालय में संयुक्त सचिव के पद पर कार्यरत हैं। अजय कुमार का कूटनीतिक करियर करीब 24 साल का है और वे पश्चिम एशिया के मामलों के जानकार माने जाते हैं। इराक में भारत के बढ़ते आर्थिक और ऊर्जा संबंधों के बीच उनकी नियुक्ति महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
इसके अलावा, 1993 बैच के वरिष्ठ आईएफएस अधिकारी सौमेंदु बागची को अब स्विट्जरलैंड में भारत का अगला राजदूत बनाया गया है। फिलहाल वह बगदाद में भारत के राजदूत हैं। सौमेंदु बागची पिछले कुछ वर्षों से इराक में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे थे।

उनके कार्यकाल में भारत-इराक के बीच व्यापार, सुरक्षा और सांस्कृतिक सहयोग को नई गति मिली थी। अब उन्हें बर्न भेजा जा रहा है, जहां भारत के यूरोप के साथ व्यापार, निवेश और बहुपक्षीय मंचों पर संबंधों को और मजबूत करने की जिम्मेदारी होगी।

स्विट्जरलैंड भारत के लिए यूरोप में एक महत्वपूर्ण साझेदार है। दोनों देशों के बीच फार्मा, बैंकिंग, घड़ियां और प्रिसिजन इंजीनियरिंग के क्षेत्र में गहरे आर्थिक संबंध हैं। साथ ही स्विट्जरलैंड जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों का मुख्यालय होने के कारण भारत की विदेश नीति के लिए भी अहम है।

ऐसे में बागची के अनुभव का फायदा भारत को वहां मिलेगा। इराक भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से भी अहम देश है। भारत इराक से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल आयात करता है।

इसके अलावा दोनों देशों के बीच सुरक्षा सहयोग, हज यात्रा और भारतीय समुदाय के कल्याण जैसे मुद्दे भी अहम हैं। अजय कुमार के संयुक्त सचिव के रूप में मंत्रालय में रहे अनुभव से उम्मीद है कि वे द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊंचाई देंगे।

विदेश मंत्रालय ने कहा कि दोनों राजदूतों के कार्यभार ग्रहण करने की तारीख की घोषणा जल्द की जाएगी। राजनयिक हलकों में माना जा रहा है कि यह फेरबदल भारत की पश्चिम एशिया और यूरोप नीति को संतुलित करने की दिशा में एक कदम है।

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