स्टारलिंक ने 30,000 सैटेलाइट वाले 'जेन 2 कॉन्स्टेलेशन' को लॉन्च करने के लिए भारत से मंज़ूरी


विज्ञान 20 August 2026
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स्टारलिंक ने 30,000 सैटेलाइट वाले 'जेन 2 कॉन्स्टेलेशन' को लॉन्च करने के लिए भारत से मंज़ूरी

एलन मस्क की कंपनी स्टारलिंक ने भारत के स्पेस रेगुलेटर के पास अपने नेक्स्ट-जेनरेशन सैटेलाइट कम्युनिकेशन नेटवर्क के लिए मंज़ूरी की नई अर्ज़ी दी है। यह देश के उभरते सैटेलाइट कम्युनिकेशन मार्केट में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की एक और कोशिश है। कंपनी ने अपने 'Gen 2 कॉन्स्टेलेशन' (सैटेलाइट्स के समूह) की मंज़ूरी के लिए इंडियन नेशनल स्पेस प्रमोशन एंड ऑथराइज़ेशन सेंटर (IN-SPACe) से संपर्क किया है। यह कॉन्स्टेलेशन लो-अर्थ ऑर्बिट में 340-615 km की ऊंचाई पर काम करेगा।

Gen 2 की अर्ज़ी में डायरेक्ट-टू-डिवाइस टेक्नोलॉजी शामिल है ET की रिपोर्ट के मुताबिक, नई अर्ज़ी में लगभग 30,000 लो-अर्थ ऑर्बिट सैटेलाइट्स शामिल हैं और इसमें डायरेक्ट-टू-डिवाइस (D2D) टेक्नोलॉजी भी है। इस टेक्नोलॉजी से सैटेलाइट नेटवर्क बिना किसी खास उपकरण के सीधे मोबाइल फोन से कनेक्ट हो सकेंगे। यह अर्ज़ी ऐसे समय में दी गई है जब भारत D2D कनेक्टिविटी समेत सैटेलाइट कम्युनिकेशन की अतिरिक्त क्षमताओं की इजाज़त देने के लिए नियमों पर विचार कर रहा है।

इससे पहले Gen 2 की अर्ज़ी खारिज कर दी गई थी स्टारलिंक ने पहले भारत में सर्विस शुरू करने के लिए अपने Gen 1 और Gen 2 दोनों कॉन्स्टेलेशन के लिए अर्ज़ी दी थी। IN-SPACe ने कंपनी की Gen 2 वाली पिछली अर्ज़ी (जिसमें लगभग 30,000 सैटेलाइट्स थे) को खारिज कर दिया था, क्योंकि कुछ फीचर्स और इस्तेमाल किए गए स्पेक्ट्रम बैंड रेगुलेटरी ज़रूरतों को पूरा नहीं करते थे। जुलाई 2025 में, IN-SPACe ने स्टारलिंक के सिर्फ़ Gen 1 कॉन्स्टेलेशन (4,408 लो-अर्थ ऑर्बिट सैटेलाइट्स) को मंज़ूरी दी थी, जिसका मकसद पारंपरिक ब्रॉडबैंड सर्विस देना है।

ग्लोबल फ्लीट प्लान और कॉम्पिटिटिव माहौल SpaceX का प्लान दुनिया भर में अपने Gen 2 कॉन्स्टेलेशन के लिए लगभग 42,000 सैटेलाइट्स तैनात करने का है, लेकिन उसने भारत में इनमें से लगभग 30,000 के लिए मंज़ूरी मांगी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वह बाद में अतिरिक्त सैटेलाइट्स के लिए अर्ज़ी दे सकती है। अगर मंज़ूरी मिल जाती है, तो Gen 2 नेटवर्क स्टारलिंक को अपने प्रतिद्वंद्वियों - जैसे रिलायंस जियो का प्रस्तावित 1,600-सैटेलाइट वाला लो-अर्थ ऑर्बिट कॉन्स्टेलेशन, अमेज़न का Leo (पहले प्रोजेक्ट कुइपर) और यूटेलसैट वनवेब - के मुकाबले कवरेज और क्षमता दोनों मामलों में बढ़त दिला सकता है।

रेगुलेटरी मंज़ूरी अभी बाकी है

भारत में सर्विस शुरू करने से पहले सैटेलाइट्स के लिए IN-SPACe की मंज़ूरी ज़रूरी है। हालांकि, स्टारलिंक, यूटेलसैट वनवेब और लक्ज़मबर्ग की कंपनी SES के साथ जियो के जॉइंट वेंचर समेत किसी भी नॉन-जियोस्टेशनरी सैटेलाइट ऑपरेटर ने अब तक देश में कमर्शियल ऑपरेशन शुरू नहीं किया है। इसकी मुख्य वजह सिक्योरिटी क्लीयरेंस का पेंडिंग होना और स्पेक्ट्रम आवंटन व कीमत तय करने के नियमों का अभी तक तय न हो पाना है।

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