किसी भी समाज की प्रगति का आकलन केवल आर्थिक वृद्धि, प्रति व्यक्ति आय या रोजगार के आंकड़ों से नहीं किया जा सकता। यह भी देखना जरूरी है कि विकास का लाभ समाज के विभिन्न वर्गों तक कितना पहुंच रहा है और प्रत्येक व्यक्ति को उसके श्रम का उचित मूल्य मिल रहा है या नहीं। इसी संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय समान वेतन दिवस का महत्व सामने आता है। प्रत्येक वर्ष 18 सितंबर को मनाया जाने वाला यह दिवस महिलाओं और पुरुषों को समान या समान मूल्य के काम के लिए समान पारिश्रमिक देने के सिद्धांत को रेखांकित करता है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, दुनिया में महिलाओं को औसतन पुरुषों की तुलना में करीब 20 प्रतिशत कम वेतन मिलता है।
समान वेतन केवल आय का विषय नहीं, बल्कि सम्मान, आर्थिक स्वतंत्रता, सामाजिक सुरक्षा और समावेशी विकास से जुड़ा है। समान योग्यता, कौशल और जिम्मेदारी के बावजूद केवल लिंग के आधार पर कम पारिश्रमिक मिलना श्रम के मूल्यांकन में असमानता को दर्शाता है। लैंगिक वेतन अंतर के पीछे रोजगार की प्रकृति, पेशे का चुनाव, शिक्षा-कौशल, काम के घंटे, पदोन्नति और नेतृत्व के अवसर जैसे कई कारण हैं। मातृत्व तथा परिवार की देखभाल की जिम्मेदारियां भी महिलाओं के करियर और आय को प्रभावित करती हैं। इसलिए समान वेतन सुनिश्चित करना केवल महिलाओं के अधिकार का विषय नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण, समावेशी और टिकाऊ अर्थव्यवस्था की महत्वपूर्ण शर्त है।
समान वेतन का वास्तविक अर्थ
समान वेतन का अर्थ है कि समान काम या समान मूल्य के काम के लिए कर्मचारी को लिंग के आधार पर अलग-अलग पारिश्रमिक न दिया जाए। लेकिन इस अवधारणा का दायरा केवल एक जैसे पदों तक सीमित नहीं है। कई बार दो नौकरियां देखने में अलग होती हैं, लेकिन उनमें कौशल, जिम्मेदारी, प्रयास और काम की परिस्थितियां समान स्तर की होती हैं। ऐसे मामलों में केवल पदनाम के आधार पर वेतन का अंतर उचित नहीं माना जा सकता है। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर “Equal Pay for Work of Equal Value” की अवधारणा पर जोर दिया जाता है। संयुक्त राष्ट्र और ILO दोनों इस बात को रेखांकित करते हैं कि वेतन समानता का उद्देश्य केवल एक ही पद पर बैठे महिला और पुरुष के वेतन को बराबर करना नहीं, बल्कि समान मूल्य वाले काम का निष्पक्ष मूल्यांकन सुनिश्चित करना भी है। वेतन का अर्थ भी केवल मूल वेतन नहीं है। बोनस, प्रोत्साहन राशि, भत्ते, पदोन्नति, प्रशिक्षण के अवसर, सामाजिक सुरक्षा और अन्य रोजगार लाभ भी कर्मचारी की वास्तविक आर्थिक स्थिति को प्रभावित करते हैं। इसलिए समान वेतन की चर्चा व्यापक रोजगार परिस्थितियों के साथ की जानी चाहिए।
दुनिया में लैंगिक वेतन अंतर की स्थिति
वैश्विक श्रम बाजार में महिलाओं की भागीदारी पिछले दशकों में बढ़ी है, लेकिन रोजगार में प्रवेश और आय के स्तर पर अब भी अंतर दिखाई देता है। ILO के अनुसार, महिलाओं की वैश्विक श्रम बल भागीदारी पुरुषों की तुलना में काफी कम है और वैश्विक स्तर पर लैंगिक वेतन अंतर लगभग 20 प्रतिशत के आसपास बना हुआ है। यह अंतर अलग-अलग देशों और आर्थिक क्षेत्रों में अलग-अलग रूप में दिखाई देता है। वेतन अंतर का अर्थ यह नहीं है कि हर महिला को उसी पद पर काम करने वाले हर पुरुष से कम वेतन मिलता है। यह आम तौर पर महिलाओं और पुरुषों की औसत कमाई के बीच अंतर को दर्शाता है। इस अंतर के पीछे शिक्षा, पेशे का चुनाव, काम के घंटे, अनुभव, रोजगार का प्रकार, नेतृत्व के पदों तक पहुंच, मातृत्व और देखभाल संबंधी जिम्मेदारियों सहित कई कारण हो सकते हैं। इसीलिए केवल औसत वेतन के आंकड़े देखकर समस्या की पूरी तस्वीर समझना कठिन है। वास्तविक विश्लेषण के लिए यह देखना जरूरी है कि समान योग्यता वाले लोगों को समान अवसर मिल रहे हैं या नहीं और महिलाओं की कमाई वाले क्षेत्रों में अधिक मौजूदगी का कारण क्या है।
वेतन अंतर के पीछे कई परतें
लैंगिक वेतन अंतर किसी एक कारण का परिणाम नहीं है। इसके पीछे श्रम बाजार की संरचना और सामाजिक परिस्थितियां दोनों काम करती हैं। कई देशों में महिलाएं शिक्षा, स्वास्थ्य, देखभाल, घरेलू सेवा और कुछ अन्य अपेक्षाकृत कम वेतन वाले क्षेत्रों में अधिक संख्या में काम करती हैं। दूसरी ओर, अधिक वेतन वाले तकनीकी, वित्तीय और वरिष्ठ प्रबंधन पदों पर पुरुषों की हिस्सेदारी कई जगह अधिक है। ILO के अनुसार, व्यावसायिक अलगाव, रोजगार के अवसरों तक असमान पहुंच, भेदभाव और मातृत्व से जुड़ी आय संबंधी चुनौतियां वेतन अंतर को प्रभावित करती हैं। महिलाओं के करियर में बच्चों की देखभाल या परिवार की जिम्मेदारियों के कारण आने वाला व्यवधान लंबे समय तक उनकी आय और पदोन्नति को प्रभावित कर सकता है। इसका एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि महिलाओं की शिक्षा का स्तर बढ़ने के बावजूद केवल शिक्षा हासिल कर लेना अपने आप समान वेतन की गारंटी नहीं देता। शिक्षा से रोजगार के अवसर बढ़ते हैं, लेकिन रोजगार की गुणवत्ता, पेशे का चुनाव, कार्यस्थल की नीतियां और करियर में आगे बढ़ने की संभावनाएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।
मातृत्व और देखभाल का आर्थिक प्रभाव
समान वेतन की चर्चा में घर और कार्यस्थल के बीच संबंध को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बच्चों, बुजुर्गों और परिवार के अन्य सदस्यों की देखभाल का बड़ा हिस्सा कई समाजों में महिलाओं के हिस्से आता है। इसका सीधा असर उनके रोजगार के प्रकार, काम के घंटे और करियर की निरंतरता पर पड़ सकता है। कई महिलाएं मातृत्व के बाद नौकरी छोड़ देती हैं या कम घंटे वाले काम को चुनती हैं। कुछ मामलों में वे लंबे समय तक औपचारिक रोजगार से बाहर रहती हैं। इससे उनके अनुभव, पदोन्नति और भविष्य की कमाई पर असर पड़ सकता है। ILO ने भी मातृत्व से जुड़े वेतन दंड को लैंगिक वेतन अंतर का एक महत्वपूर्ण कारण माना है। इस चुनौती का समाधान केवल महिलाओं से अधिक काम करने की अपेक्षा करके नहीं हो सकता। परिवार में देखभाल की जिम्मेदारी का संतुलित बंटवारा, बेहतर मातृत्व एवं पितृत्व नीतियां, क्रेच सुविधा, लचीली कार्य व्यवस्था और सामाजिक सुरक्षा जैसी व्यवस्थाएं महिलाओं को रोजगार में बनाए रखने में मदद कर सकती हैं।
भारत में समान वेतन का संवैधानिक आधार
भारत में समान वेतन की अवधारणा को संवैधानिक समर्थन प्राप्त है। संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की बात करता है। अनुच्छेद 15 लिंग सहित विभिन्न आधारों पर भेदभाव के खिलाफ संरक्षण देता है। अनुच्छेद 16 सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर की व्यवस्था करता है। इसके अलावा अनुच्छेद 39(d) राज्य को पुरुषों और महिलाओं के लिए समान काम पर समान वेतन सुनिश्चित करने की दिशा में नीति बनाने का निर्देश देता है। इस संवैधानिक दृष्टिकोण ने भारत में श्रम कानूनों और नीतियों के लिए महत्वपूर्ण आधार तैयार किया। समान पारिश्रमिक के सिद्धांत को कानूनी रूप देने के लिए समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976 महत्वपूर्ण कदम था। बाद में श्रम कानूनों के व्यापक पुनर्गठन के तहत इसे वेतन संहिता, 2019 में समाहित किया गया।
वेतन संहिता और कानूनी प्रावधान
वेतन संहिता, 2019 में लिंग के आधार पर वेतन संबंधी भेदभाव को प्रतिबंधित किया गया है। संहिता के प्रावधानों के अनुसार, समान या समान प्रकृति के काम के संबंध में किसी कर्मचारी के साथ लिंग के आधार पर वेतन में भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। समान काम या समान प्रकृति के काम के लिए भर्ती और रोजगार की शर्तों में भी लिंग आधारित भेदभाव को रोकने का प्रावधान है। यह कानूनी व्यवस्था इस बात को स्पष्ट करती है कि समान वेतन केवल नैतिक अपील नहीं, बल्कि श्रम अधिकार और कानूनी व्यवस्था का हिस्सा है। हालांकि किसी कानून की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके प्रावधानों के बारे में श्रमिकों को कितनी जानकारी है, शिकायतों का समाधान कितनी प्रभावी ढंग से होता है और कार्यस्थलों पर अनुपालन की निगरानी कितनी मजबूत है।
भारत के श्रम बाजार में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी
भारत में महिला श्रम भागीदारी के आंकड़ों में हाल के वर्षों में सुधार दिखाई देता है। MoSPI के PLFS 2023-24 के अनुसार, 15 वर्ष और उससे अधिक आयु की महिलाओं की श्रम बल भागीदारी दर सामान्य स्थिति के आधार पर 41.7 प्रतिशत रही, जो 2022-23 के 37 प्रतिशत से अधिक थी। इसी अवधि में महिलाओं का श्रमिक जनसंख्या अनुपात 40.3 प्रतिशत रहा। PLFS 2025 के आंकड़े भी महिला रोजगार की स्थिति में बदलाव की तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। वर्ष 2025 में महिलाओं की श्रम बल भागीदारी और रोजगार की स्थिति को ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों के अलग-अलग संदर्भों में देखा जा सकता है। PLFS 2025 की विस्तृत तालिकाएं बताती हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की श्रम बल भागीदारी शहरी क्षेत्रों की तुलना में काफी अधिक रही, जबकि शहरी महिलाओं की भागीदारी अभी भी अपेक्षाकृत कम रही। ये आंकड़े यह संकेत देते हैं कि रोजगार में महिलाओं की भागीदारी बढ़ना महत्वपूर्ण उपलब्धि है, लेकिन केवल रोजगार में प्रवेश पर्याप्त नहीं है। रोजगार की गुणवत्ता, आय, स्थायित्व, सामाजिक सुरक्षा और आगे बढ़ने के अवसर भी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।
ग्रामीण और शहरी महिलाओं की अलग चुनौतियां
भारत में महिला रोजगार को एक समान स्थिति के रूप में देखना सही नहीं होगा। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं कृषि, पशुपालन, घरेलू उद्यम और अन्य स्वरोजगार गतिविधियों में बड़ी भूमिका निभाती हैं। शहरी क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सेवा, प्रशासन, उद्योग, व्यापार और तकनीक सहित अनेक क्षेत्रों में उनकी भागीदारी बढ़ रही है। PLFS 2025 की तालिकाओं में भी रोजगार की प्रकृति में यह अंतर दिखाई देता है। कई राज्यों में ग्रामीण महिलाओं का बड़ा हिस्सा स्वरोजगार से जुड़ा है, जबकि शहरी क्षेत्रों में नियमित वेतन या वेतनभोगी रोजगार की हिस्सेदारी कई जगह अधिक है। इसलिए समान वेतन की नीति बनाते समय ग्रामीण और शहरी श्रम बाजार की अलग-अलग परिस्थितियों को ध्यान में रखना जरूरी है। असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं के लिए न्यूनतम मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा और रोजगार की स्थिरता जैसे सवाल अधिक महत्वपूर्ण हो सकते हैं, जबकि औपचारिक क्षेत्र में वेतन पारदर्शिता, पदोन्नति और नेतृत्व के अवसर प्रमुख मुद्दे बनते हैं।
असंगठित क्षेत्र की बड़ी चुनौती
भारत में रोजगार का एक बड़ा हिस्सा अनौपचारिक या असंगठित क्षेत्र से जुड़ा है। यहां काम करने वाली महिलाओं को कई बार लिखित अनुबंध, नियमित वेतन, सामाजिक सुरक्षा और शिकायत निवारण जैसी सुविधाएं सीमित रूप में मिलती हैं। घरेलू काम, कृषि, निर्माण, छोटे कारोबार और विभिन्न प्रकार के स्वरोजगार में महिलाओं का योगदान अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन उनके काम का आर्थिक मूल्यांकन हमेशा उसी अनुपात में दिखाई नहीं देता। समान वेतन का लक्ष्य हासिल करने के लिए असंगठित क्षेत्र पर विशेष ध्यान आवश्यक है। केवल कॉरपोरेट क्षेत्र की वेतन संरचना में सुधार करने से पूरी तस्वीर नहीं बदलेगी। न्यूनतम मजदूरी का प्रभावी पालन, श्रमिकों की पहचान, सामाजिक सुरक्षा तक पहुंच और श्रम अधिकारों के बारे में जागरूकता भी जरूरी है।
समान वेतन और आर्थिक विकास
समान वेतन को केवल सामाजिक न्याय का विषय मानना इसके आर्थिक महत्व को सीमित कर देता है। जब महिलाओं को उनके श्रम का उचित आर्थिक मूल्य मिलता है, तो उनकी व्यक्तिगत आर्थिक स्वतंत्रता बढ़ती है। इससे परिवार की आय और आर्थिक सुरक्षा मजबूत हो सकती है। महिलाओं की आय बढ़ने का प्रभाव बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और परिवार के भविष्य के निवेश पर भी पड़ सकता है। व्यापक अर्थव्यवस्था के स्तर पर महिलाओं की क्षमता और कौशल का बेहतर उपयोग उत्पादन और रोजगार की संभावनाओं को बढ़ा सकता है। ILO भी लैंगिक वेतन अंतर को कम करने को केवल समानता का सवाल नहीं, बल्कि आर्थिक विकास और श्रम क्षमता के बेहतर उपयोग से जुड़ा विषय मानता है।
शिक्षा और कौशल से आगे रोजगार की गुणवत्ता
महिलाओं की शिक्षा में सुधार समान वेतन की दिशा में आवश्यक आधार है, लेकिन यह अकेला समाधान नहीं है। शिक्षा के साथ बाजार की जरूरतों के अनुरूप कौशल, डिजिटल दक्षता और तकनीकी प्रशिक्षण तक समान पहुंच जरूरी है। विशेष रूप से विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित यानी STEM क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना महत्वपूर्ण है। डिजिटल अर्थव्यवस्था, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, साइबर सुरक्षा और उन्नत विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा हो रहे हैं। यदि महिलाओं को इन क्षेत्रों के लिए आवश्यक कौशल और अवसर मिलते हैं, तो रोजगार की गुणवत्ता और आय दोनों में सुधार की संभावनाएं बढ़ेंगी।
तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की नई चुनौती
तकनीक श्रम बाजार में नए अवसर पैदा कर रही है, लेकिन इसके साथ नई चुनौतियां भी सामने आ रही हैं। भर्ती, वेतन निर्धारण और प्रदर्शन मूल्यांकन में डिजिटल प्रणालियों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का इस्तेमाल बढ़ रहा है। ऐसे में यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि तकनीकी प्रणालियों में मौजूद डेटा या एल्गोरिदम किसी लैंगिक पूर्वाग्रह को आगे न बढ़ाएं। दूसरी ओर, डिजिटल कार्य, दूरस्थ रोजगार और लचीले कार्य विकल्प उन महिलाओं के लिए उपयोगी हो सकते हैं जिन्हें पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण पारंपरिक कार्यस्थल में कठिनाई होती है। लेकिन ऐसी व्यवस्था तभी समान अवसर देगी जब काम की गुणवत्ता, वेतन और पदोन्नति के अवसर भी बराबर हों। ILO ने 2026 में प्रकाशित अपने नए मार्गदर्शन में भी तकनीकी बदलावों के साथ वेतन पारदर्शिता, वस्तुनिष्ठ नौकरी मूल्यांकन और देखभाल नीतियों को समान वेतन की रणनीति का हिस्सा माना है।
वेतन पारदर्शिता क्यों जरूरी है
वेतन अंतर को कम करने की दिशा में वेतन पारदर्शिता महत्वपूर्ण उपाय हो सकती है। जब किसी संस्था में समान या समान मूल्य के काम के लिए वेतन निर्धारित करने के स्पष्ट मानदंड हों, तो अनावश्यक असमानता की संभावना कम होती है। कंपनियां नियमित रूप से यह देख सकती हैं कि समान पद, अनुभव और जिम्मेदारी वाले कर्मचारियों के वेतन में कोई अनुचित अंतर तो नहीं है। नौकरी के मूल्यांकन के लिए स्पष्ट मानदंड, पारदर्शी पदोन्नति व्यवस्था और शिकायत निवारण की प्रभावी प्रणाली कार्यस्थल में भरोसा बढ़ा सकती है।ILO ने भी वेतन पारदर्शिता, वस्तुनिष्ठ नौकरी मूल्यांकन, श्रम निरीक्षण, सामाजिक संवाद और सामाजिक सुरक्षा को वेतन समानता हासिल करने की व्यापक रणनीति के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में रेखांकित किया है।
कानून के साथ सामाजिक सोच में बदलाव
कानून समान वेतन के लिए जरूरी है, लेकिन केवल कानून से सामाजिक व्यवहार नहीं बदलता। कई बार रोजगार और पेशे से जुड़े निर्णय सामाजिक धारणाओं से प्रभावित होते हैं। यदि कुछ कामों को स्वाभाविक रूप से पुरुषों का और कुछ कामों को महिलाओं का काम माना जाता रहेगा, तो श्रम बाजार में पेशागत असमानता बनी रह सकती है। घरेलू कार्य और बच्चों या बुजुर्गों की देखभाल को केवल महिलाओं की जिम्मेदारी मानने की सोच में बदलाव भी जरूरी है। परिवार में जिम्मेदारियों का समान बंटवारा महिलाओं को शिक्षा, रोजगार और करियर में निरंतरता बनाए रखने में मदद कर सकता है। इसलिए समान वेतन का अभियान कार्यस्थल से बाहर परिवार, विद्यालय और समाज तक भी पहुंचना चाहिए।
समान वेतन कानून का प्रभावी क्रियान्वयन जरूरी
समान वेतन की दिशा में पहला कदम स्पष्ट और प्रभावी कानूनी व्यवस्था है, लेकिन उसके बाद कई स्तरों पर लगातार प्रयास की आवश्यकता है। कार्यस्थलों पर समान वेतन संबंधी नियमों के अनुपालन की निगरानी मजबूत करनी होगी। श्रमिकों को उनके अधिकारों की जानकारी देनी होगी। शिकायत निवारण व्यवस्था सरल और सुलभ बनानी होगी। दूसरा महत्वपूर्ण क्षेत्र महिला रोजगार की गुणवत्ता है। महिलाओं की श्रम बल भागीदारी बढ़ने के साथ यह भी जरूरी है कि उन्हें सुरक्षित, नियमित और सम्मानजनक रोजगार मिले। कौशल विकास, तकनीकी शिक्षा और उच्च उत्पादकता वाले क्षेत्रों तक पहुंच बढ़ानी होगी। तीसरा क्षेत्र देखभाल अर्थव्यवस्था है। क्रेच, मातृत्व सुविधाएं, पितृत्व अवकाश, लचीली कार्य व्यवस्था और सामाजिक सुरक्षा जैसी नीतियां महिलाओं को रोजगार में बनाए रखने में मदद कर सकती हैं। चौथा क्षेत्र डेटा और पारदर्शिता है। अलग-अलग क्षेत्रों, रोजगार के प्रकार और सामाजिक समूहों के आधार पर विश्वसनीय आंकड़े उपलब्ध होने चाहिए, ताकि नीति निर्माण वास्तविक स्थिति पर आधारित हो। भारत में PLFS जैसे नियमित सर्वेक्षण श्रम बाजार की बदलती तस्वीर समझने के लिए महत्वपूर्ण आधार उपलब्ध कराते हैं।
श्रम का मूल्य लिंग से नहीं, योगदान से तय हो
अंतरराष्ट्रीय समान वेतन दिवस हमें यह समझने का अवसर देता है कि आर्थिक समानता केवल आय बढ़ाने का प्रश्न नहीं है। यह इस बात से भी जुड़ी है कि व्यक्ति के श्रम, कौशल और जिम्मेदारी का मूल्यांकन निष्पक्ष तरीके से किया जा रहा है या नहीं। महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ने के साथ अब अगली चुनौती रोजगार की संख्या से आगे बढ़कर रोजगार की गुणवत्ता और आय की समानता सुनिश्चित करने की है। भारत में संविधान ने समानता का मजबूत आधार दिया है और वेतन संहिता, 2019 ने समान या समान प्रकृति के काम के लिए लिंग आधारित वेतन भेदभाव को प्रतिबंधित किया है। वहीं, PLFS के आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं की श्रम बल भागीदारी में हाल के वर्षों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
फिर भी वास्तविक समानता का लक्ष्य केवल कानूनी प्रावधानों से पूरा नहीं होगा। इसके लिए कार्यस्थलों पर पारदर्शी वेतन व्यवस्था, समान अवसर, कौशल विकास, सामाजिक सुरक्षा, देखभाल संबंधी सुविधाएं और सामाजिक सोच में बदलाव आवश्यक हैं। वैश्विक स्तर पर महिलाओं का औसत वेतन पुरुषों से लगभग 20 प्रतिशत कम होना बताता है कि चुनौती अभी व्यापक है। समान वेतन का अर्थ अंततः केवल समान राशि देना नहीं, बल्कि काम के मूल्य को समान दृष्टि से देखना है। जब किसी समाज में महिला और पुरुष के श्रम का मूल्यांकन उनके लिंग के बजाय उनकी योग्यता, जिम्मेदारी, कौशल और योगदान के आधार पर होगा, तभी आर्थिक विकास अधिक समावेशी और न्यायपूर्ण बन सकेगा। अंतरराष्ट्रीय समान वेतन दिवस इसी व्यापक लक्ष्य की याद दिलाता है। काम का मूल्य व्यक्ति के लिंग से नहीं, उसके योगदान से तय होना चाहिए।
















