वर्ल्ड बैंक के प्रेसिडेंट अजय बंगा ने कहा है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) भारत और विकासशील देशों में किसानों और दूसरे कामगारों की जिंदगी बदल सकता है। इससे विकसित अर्थव्यवस्थाओं की तरह नौकरियों पर तुरंत कोई खतरा नहीं आएगा। बंगा ने उत्तर प्रदेश में महिला किसानों की मदद करने वाली एक एआई पहल का जिक्र किया, जो उन्हें साधारण मोबाइल फोन का इस्तेमाल करके फसलों की बीमारियों का पता लगाने में मदद करती है।
बंगा ने कहा कि विकसित देशों में एआई पर होने वाली बहस में बड़े लैंग्वेज मॉडल और जेनरेटिव एआई का दबदबा है। ऐसी टेक्नोलॉजी जिनके लिए बहुत अधिक कंप्यूटिंग पावर, एनर्जी, डेटा, कुशल लोग और पूंजी की जरूरत होती है। ज्यादातर उभरती अर्थव्यवस्थाओं में अभी तक ये सभी चीजें एक साथ मौजूद नहीं हैं। बंगा ने कहा, “छोटे एआई,” यानी ऐसे प्रेडिक्टिव टूल जो खेती की उत्पादकता, शिक्षा, कौशल और हेल्थकेयर को बेहतर बना सकते हैं, उन में बड़े बदलाव लाने का मौका देखते हैं।
कोलंबिया यूनिवर्सिटी में सीएनएन के फरीद जकारिया के साथ बातचीत के दौरान बंगा ने उत्तर प्रदेश का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे ऐसी टेक्नोलॉजी का पहले से ही व्यावहारिक इस्तेमाल किया जा रहा है। बंगा ने कहा, “भारत के उत्तर प्रदेश में, हमने गूगल के साथ मिलकर ऐसे एप्लिकेशन लॉन्च किए हैं, जिनसे अनपढ़ महिला किसान एक को-ऑपरेटिव से जुड़ती हैं।” उन्होंने बताया कि कैसे एक महिला किसान बिना किसी महंगे उपकरण या तकनीकी जानकारी के इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर सकती है।
बंगा ने कहा, “हम उन्हें एक ऐसा टूल देते हैं, जिससे वे 3जी फोन पर बोल सकती हैं, कैमरे को किसी बीमार पौधे की पत्ती के पिछले हिस्से की ओर कर सकती हैं और वह टूल उन्हें बीमारी के बारे में बता देता है। साथ ही यह भी बताता है कि स्थानीय को-ऑपरेटिव से 25 रुपये में कौन-सी कीटनाशक दवा मिलेगी। बस बटन दबाना होता है और दवा आपकी हो जाती है।” बंगा ने कहा, “अब आपने एक अनपढ़ महिला किसान के लिए भी बेहतरीन जानकारी तक पहुंच को आसान बना दिया है। और मेरे लिए, यह असल में एआई का ही कमाल है।”
उन्होंने कहा कि हेल्थकेयर और दूसरे सेक्टर में भी ऐसे ही मौके मौजूद हैं। बंगा की बातों ने इस ग्लोबल बहस पर एक बिल्कुल अलग नजरिए से बात की कि क्या ज्यादा काबिल एआई सिस्टम बड़ी संख्या में नौकरियां खत्म कर देंगे। उन्होंने तर्क दिया कि अमीर और विकासशील देशों पर इसका तुरंत असर बहुत अलग-अलग होगा। बंगा ने कहा कि विकसित देशों में, ‘लार्ज लैंग्वेज मॉडल’ (एलएलएम) से एक-तिहाई तक नौकरियां प्रभावित हो सकती हैं। लेकिन जैसे-जैसे देशों की आय कम होती जाती है, यह तस्वीर काफी बदल जाती है।
बंगा ने कहा, “असल में, विकसित देशों में एलएलएम से एक-तिहाई नौकरियां प्रभावित हो सकती हैं। लेकिन जैसे ही आप मध्यम आय वाले देश में आते हैं, यह संख्या सिंगल डिजिट में आ जाती है। जब आप कम आय वाले देश में पहुंचते हैं, तो यह शून्य हो जाती है।” बंगा का तर्क है कि अमीर देशों में नौकरियों के जाने या बदलने के दबाव पर जो चर्चा हो रही है, उसका सामना करने से पहले विकासशील देशों के पास प्रोडक्टिविटी और रोजगार बढ़ाने के लिए अभी भी काफी गुंजाइश है।
बंगा ने कहा कि लार्ज लैंग्वेज मॉडल के लिए पांच जरूरी चीजों की जरूरत होती है, जो कई उभरते बाजारों में आसानी से नहीं मिलतीं। उन्होंने कहा, “मेरा मतलब है, विकसित देशों में लार्ज लैंग्वेज मॉडल और जेनरेटिव एआई पर चर्चा होती है। असलियत यह है कि उभरते बाजारों में एलएलएम को चलाने के लिए असल में क्या चाहिए? इसके लिए बहुत ज्यादा कंप्यूटिंग पावर और बड़ी मात्रा में ऊर्जा चाहिए। मेरा मानना है कि इसके लिए विकसित देश भी संघर्ष कर रहे हैं।”
उन्होंने कहा, “इसके लिए डेटा चाहिए। ऐसे लोग चाहिए जो इसे मैनेज करना जानते हों और फिर इसके लिए कैपिटल (पूंजी) चाहिए। बहुत कम उभरते बाजार ऐसे हैं जहां ये पांचों चीजें एक साथ मौजूद हैं।” बंगा ने कहा कि इसीलिए, उभरती अर्थव्यवस्थाओं के पास छोटे एआई एप्लीकेशन इस्तेमाल करने का ज़्यादा तुरंत मौका है। उन्होंने कहा, “इसलिए उभरते हुए बाजारों में असल में ‘छोटे एआई’ एक बड़ा मौका है। ‘छोटे एआई’ का मतलब है ऐसे प्रेडिक्टिव टूल्स (अनुमान लगाने वाले टूल्स) जिनका इस्तेमाल किसानों की प्रोडक्टिविटी बढ़ाने, बेहतर शिक्षा और स्किलिंग देने या हेल्थकेयर में क्षमताएं बेहतर करने के लिए किया जाता है।”
इस चर्चा में विकसित अर्थव्यवस्थाओं के साथ अंतर पर भी बात हुई, जहां एआई से करियर के स्थापित रास्तों और व्हाइट-कॉलर नौकरियों पर असर पड़ सकता है। बंगा के साथ मौजूद ग्रीस के प्रधानमंत्री किरियाकोस मित्सोताकिस ने वकालत जैसे प्रोफेशन का जिक्र किया, जहां एआई तेजी से रिसर्च और डॉक्यूमेंटेशन का काम कर सकता है, ऐसे काम जो आम तौर पर युवा कर्मचारियों को दिए जाते हैं। मित्सोताकिस ने चेतावनी दी कि विकसित देशों में मिडिल-क्लास वर्कर्स को एआई और रोबोटिक्स, दोनों से दबाव का सामना करना पड़ सकता है।
मित्सोताकिस ने कहा, “भारत के किसानों के लिए तो यह बहुत अच्छी बात है। लेकिन विकसित दुनिया के मिडिल क्लास के लिए, जो पहले ही ग्लोबलाइजेशन की मार झेल चुका है, अब एआई व्हाइट-कॉलर नौकरियों पर असर डाल रहा है और रोबोटिक्स मैन्युफैक्चरिंग की बची-खुची नौकरियों को खत्म कर रहा है। ऐसे में भविष्य को लेकर उम्मीद की अधिक गुंजाइश नहीं बचती।”


















