विश्व कपास दिवस : खेत से करघे तक समृद्धि और आत्मनिर्भरता की कहानी


देश 07 October 2026
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विश्व कपास दिवस : खेत से करघे तक समृद्धि और आत्मनिर्भरता की कहानी

सभ्यताएं बदलीं, पहनावे के रंग और रूप बदले, समय के दौर भी ढले, पर माटी से उपजे कपास के सूत की कोमलता और उसकी सहज गर्माहट का कोई स्थायी विकल्प आज तक नहीं बन सका। कपास की यह धवल यात्रा खेतों की धूल से शुरू होकर करघों, उद्योगों और वैश्विक बाजार तक पहुंचती है। इसके पीछे किसान का श्रम, कारीगर का कौशल और अनगिनत हाथों की नीरव तपस्या छिपी है। हर वर्ष 7 अक्टूबर को मनाया जाने वाला विश्व कपास दिवस इसी श्रम और योगदान को वैश्विक सम्मान देने का अवसर है।कपास केवल एक कृषि फसल नहीं, बल्कि कृषि, उद्योग, रोजगार, व्यापार और ग्रामीण आजीविका को जोड़ने वाली महत्वपूर्ण कड़ी है।

खेत से निकला रेशा जिनिंग, कताई, बुनाई और प्रसंस्करण की विभिन्न प्रक्रियाओं से गुजरते हुए वस्त्र का रूप लेता है। इस पूरी मूल्य शृंखला में किसान, श्रमिक, बुनकर, महिला कारीगर और उद्यमी अपनी भूमिका निभाते हैं। इसलिए कपास की समृद्धि केवल खेत की पैदावार में नहीं, बल्कि उससे जुड़े व्यापक आर्थिक तंत्र में निहित है। भारत में कपास की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। ढाका की महीन मलमल से लेकर खादी और विविध हथकरघा परंपराओं तक कपास भारतीय संस्कृति, कौशल और स्वावलंबन का अभिन्न हिस्सा रहा है। आज विश्व कपास दिवस टिकाऊ उत्पादन, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, निष्पक्ष व्यापार, तकनीकी नवाचार और ग्रामीण समृद्धि की दिशा में नए संकल्प का अवसर भी है। कपास की हर सफेद फुहार में किसान की उम्मीद, श्रमिक का परिश्रम और आत्मनिर्भर भारत की संभावनाएं एक साथ दिखाई देती हैं।

कपास : सभ्यता से आधुनिक अर्थव्यवस्था तक

कपास का इतिहास मानव सभ्यता के विकास के साथ जुड़ा हुआ है। भारतीय उपमहाद्वीप में प्राचीन काल से कपास के उपयोग के प्रमाण मिलते हैं। सिंधु घाटी सभ्यता के समय भी कपास से परिचित होने के प्रमाण इतिहास में मिलते हैं। धीरे-धीरे कपास की खेती और सूती वस्त्र निर्माण की कला विकसित हुई और भारतीय वस्त्र दूर-दूर के बाजारों तक पहुंचे। भारत की मलमल, सूती साड़ियां, धोती, चादरें और अन्य वस्त्र अपनी महीन बुनाई तथा उत्कृष्ट गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। पारंपरिक बुनकरों ने स्थानीय जलवायु, संस्कृति और जरूरतों के अनुरूप कपास को अलग-अलग रूप दिए। इस प्रकार कपास केवल व्यापार की वस्तु नहीं रहा, बल्कि भारतीय जीवन शैली और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन गया। औपनिवेशिक दौर में कपास का स्वरूप वैश्विक व्यापार और औद्योगिक राजनीति से जुड़ गया। बाद में स्वतंत्रता आंदोलन में महात्मा गांधी ने चरखे और खादी को आत्मनिर्भरता, स्वदेशी और आर्थिक स्वतंत्रता के प्रतीक के रूप में स्थापित किया। इस तरह कपास भारतीय इतिहास में कृषि से आगे बढ़कर सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना का माध्यम भी बना।

भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था में कपास का महत्व

भारत दुनिया के प्रमुख कपास उत्पादक देशों में शामिल है। महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों में कपास की खेती बड़े पैमाने पर होती है। देश के अनेक क्षेत्रों में यह किसानों की आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है। कपास की खेती का एक बड़ा हिस्सा वर्षा पर निर्भर क्षेत्रों में होता है। इसलिए मानसून की स्थिति, तापमान, मिट्टी की गुणवत्ता और कीट प्रकोप का उत्पादन पर सीधा प्रभाव पड़ता है। खेती की लागत में बीज, उर्वरक, कीटनाशक, सिंचाई और श्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। उत्पादन और बाजार मूल्य में उतार-चढ़ाव के कारण किसानों की आय में भी अनिश्चितता बनी रहती है। कपास किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। उन्हें बेहतर बीज, कृषि सलाह, सिंचाई, फसल बीमा, उचित बाजार, भंडारण और पारदर्शी मूल्य व्यवस्था की आवश्यकता होती है। उत्पादन से लेकर बिक्री तक पूरी व्यवस्था मजबूत होने पर ही कपास किसानों को वास्तविक आर्थिक लाभ मिल सकता है।

खेत से बाजार तक लंबी मूल्य शृंखला

कपास की आर्थिक शक्ति उसकी पूरी मूल्य शृंखला में दिखाई देती है। खेत में तैयार हुई कपास पहले चुनाई और जिनिंग की प्रक्रिया से गुजरती है। जिनिंग में कपास के रेशे को बीज से अलग किया जाता है। इसके बाद रेशे से सूत तैयार होता है, जिसे बुनकर कपड़े में बदलते हैं। कपड़ा आगे रंगाई, छपाई और परिधान निर्माण की प्रक्रियाओं से गुजरता है और अंततः बाजार तक पहुंचता है। इस पूरी प्रक्रिया में किसान, कृषि श्रमिक, जिनिंग इकाइयां, कताई मिलें, बुनकर, रंगाई एवं प्रसंस्करण इकाइयां, परिधान निर्माता, परिवहन क्षेत्र, व्यापारी और खुदरा बाजार जुड़े होते हैं। इसलिए कपास की आर्थिक उपयोगिता खेत में समाप्त नहीं होती, बल्कि प्रत्येक चरण में इसका मूल्य बढ़ता जाता है। यही कारण है कि कपास उत्पादक क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण और मूल्य वर्धन की सुविधाएं विकसित करना महत्वपूर्ण है। यदि किसान केवल कच्ची उपज बेचने के बजाय मूल्य वर्धित गतिविधियों से जुड़ सकें तो उनकी आय बढ़ाने की संभावनाएं मजबूत हो सकती हैं।

कपड़ा उद्योग की मजबूत नींव

भारत का कपड़ा उद्योग लंबे समय से कपास पर निर्भर रहा है। सूती धागे, कपड़े और परिधानों की घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय मांग ने इस क्षेत्र को व्यापक बनाया है। कपड़ा उद्योग में बड़ी औद्योगिक इकाइयों के साथ-साथ छोटे उद्योग, पावरलूम, हथकरघा, कुटीर उद्योग और घरेलू उत्पादन इकाइयां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। वस्त्र क्षेत्र की विशेषता यह है कि यह कृषि और उद्योग के बीच सीधा संबंध स्थापित करता है। कपास की अच्छी फसल से कच्चे माल की उपलब्धता बढ़ती है, जबकि मजबूत वस्त्र उद्योग किसानों और बाजार के लिए मांग पैदा करता है। इसलिए कपास और वस्त्र उद्योग का विकास एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। भारत के लिए यह क्षेत्र निर्यात की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। सूती धागे और कपड़े के साथ तैयार परिधानों, घरेलू वस्त्रों और मूल्य वर्धित उत्पादों में वैश्विक बाजार की संभावनाएं हैं। गुणवत्ता, डिजाइन, तकनीक और टिकाऊ उत्पादन पर ध्यान देकर भारत इस क्षेत्र में अपनी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता और मजबूत कर सकता है।

रोजगार का व्यापक आधार

कपास का महत्व केवल उत्पादन और व्यापार में नहीं, बल्कि रोजगार सृजन में भी है। खेतों में बुवाई, निराई, सिंचाई और चुनाई से लेकर जिनिंग, कताई, बुनाई, प्रसंस्करण, परिवहन और परिधान निर्माण तक अनेक चरणों में रोजगार मिलता है। ग्रामीण क्षेत्रों में कपास आधारित छोटी प्रसंस्करण इकाइयां स्थापित होने से स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं। इससे लोगों को काम के लिए दूर शहरों की ओर पलायन करने की आवश्यकता कम हो सकती है। युवाओं को आधुनिक मशीन संचालन, डिजाइन, डिजिटल मार्केटिंग, गुणवत्ता नियंत्रण और वस्त्र तकनीक का प्रशिक्षण देकर इस क्षेत्र में नए रोजगार तैयार किए जा सकते हैं। कपास की मूल्य शृंखला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें पारंपरिक श्रम और आधुनिक तकनीक दोनों के लिए स्थान है। यही संतुलन इसे व्यापक रोजगार क्षमता वाला क्षेत्र बनाता है।

महिला सशक्तिकरण से जुड़ी कपास की डोर

कपास आधारित अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भूमिका अक्सर पर्याप्त रूप से दिखाई नहीं देती, जबकि खेती, चुनाई, कताई, बुनाई, कढ़ाई और परिधान निर्माण में उनका योगदान महत्वपूर्ण है। ग्रामीण और अर्ध शहरी क्षेत्रों में अनेक महिलाएं कपास तथा वस्त्र आधारित काम के माध्यम से परिवार की आय में योगदान देती हैं। महिला स्वयं सहायता समूहों को कपास आधारित उत्पादों से जोड़कर आर्थिक अवसरों का विस्तार किया जा सकता है। सूती वस्त्र, हस्तनिर्मित उत्पाद, घरेलू उपयोग की वस्तुएं और पारंपरिक शिल्प को डिजिटल बाजार उपलब्ध होने से महिलाओं के लिए नए बाजार खुल सकते हैं। यदि प्रशिक्षण, उचित पारिश्रमिक, ऋण, बाजार और सामाजिक सुरक्षा की सुविधाएं उपलब्ध हों तो कपास आधारित गतिविधियां महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता को मजबूत कर सकती हैं। इससे परिवार की आय बढ़ने के साथ महिलाओं की निर्णय लेने की क्षमता भी बढ़ती है।

खादी और हथकरघा में सांस्कृतिक पहचान

कपास भारतीय हथकरघा और खादी की आत्मा है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में कपास से बने वस्त्रों की अपनी विशिष्ट पहचान है। अलग-अलग समुदायों ने स्थानीय परंपराओं और कौशल के आधार पर बुनाई, रंगाई और डिजाइन की विशिष्ट शैलियां विकसित की हैं। खादी ने तो कपास को स्वावलंबन और राष्ट्रीय चेतना से जोड़ दिया। चरखा केवल सूत कातने का उपकरण नहीं रहा, बल्कि आत्मनिर्भरता और श्रम की प्रतिष्ठा का प्रतीक बना। आज खादी और हस्तकरघा उत्पादों को आधुनिक डिजाइन, बेहतर ब्रांडिंग और डिजिटल बाजार से जोड़कर नई पीढ़ी के उपभोक्ताओं तक पहुंचाया जा सकता है। ‘लोकल से ग्लोबल’ की अवधारणा कपास आधारित भारतीय हस्तशिल्प और हथकरघा के लिए बड़ा अवसर प्रस्तुत करती है। पारंपरिक कौशल को आधुनिक बाजार से जोड़कर सांस्कृतिक विरासत के साथ रोजगार और आय दोनों को सुरक्षित किया जा सकता है।

पर्यावरणीय चुनौतियां और टिकाऊ कपास

कपास की आर्थिक उपयोगिता जितनी महत्वपूर्ण है, उसके पर्यावरणीय पक्ष को समझना भी उतना ही आवश्यक है। कुछ क्षेत्रों में कपास की खेती के लिए पर्याप्त पानी की जरूरत होती है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के असंतुलित उपयोग से मिट्टी, जल और जैव-विविधता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। जलवायु परिवर्तन ने इन चुनौतियों को और गंभीर बनाया है। अनियमित वर्षा, अत्यधिक तापमान, सूखा और नए प्रकार के कीट फसल की उत्पादकता को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए भविष्य की कपास खेती को केवल अधिक उत्पादन पर नहीं, बल्कि टिकाऊ उत्पादन पर आधारित करना होगा। ड्रिप और माइक्रो-इरिगेशन, मृदा परीक्षण, संतुलित पोषण, एकीकृत कीट प्रबंधन, जैविक विकल्प और फसल विविधीकरण जैसी तकनीकें कपास की खेती को अधिक टिकाऊ बनाने में सहायक हो सकती हैं। जलवायु-अनुकूल किस्मों का विकास भी आने वाले समय की महत्वपूर्ण जरूरत है।

जैविक कपास और बदलती उपभोक्‍ता पसंद

आज दुनिया में पर्यावरण के प्रति जागरूक उपभोक्ताओं की संख्या बढ़ रही है। वे ऐसे उत्पादों को प्राथमिकता दे रहे हैं जिनके उत्पादन में प्रकृति और श्रमिकों के हितों का ध्यान रखा गया हो। इससे जैविक और टिकाऊ कपास की मांग बढ़ने की संभावना है। जैविक कपास में रासायनिक इनपुट के उपयोग को कम करने और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर जोर दिया जाता है। यदि किसानों को प्रमाणन, बाजार और उचित मूल्य की सुविधा मिले तो टिकाऊ कपास उनके लिए बेहतर आय का अवसर बन सकती है। भविष्य में ‘सस्टेनेबल फैशन’ और जिम्मेदार उत्पादन की मांग कपास उद्योग को नई दिशा दे सकती है। भारत अपनी कृषि परंपरा, विशाल उत्पादन आधार और वस्त्र कौशल के कारण इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण स्थान बना सकता है।

तकनीक बदल रही है कपास की खेती

कृषि तकनीक में हो रहे बदलाव कपास उत्पादन को अधिक वैज्ञानिक बनाने में मदद कर रहे हैं। उपग्रह आधारित निगरानी, मौसम पूर्वानुमान, ड्रोन, सेंसर, डिजिटल कृषि सलाह और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी तकनीकों के माध्यम से फसल की स्थिति पर नजर रखना आसान हो रहा है। ड्रोन से खेतों की निगरानी और आवश्यकता के अनुसार छिड़काव किया जा सकता है। डिजिटल माध्यमों से किसानों को मौसम, कीट प्रबंधन और बाजार से संबंधित जानकारी समय पर मिल सकती है। वैज्ञानिक तकनीक का स्थानीय अनुभव और पारंपरिक ज्ञान के साथ संयोजन कपास की खेती को अधिक प्रभावी बना सकता है। तकनीक का उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं होना चाहिए। इसका लक्ष्य लागत घटाना, पानी और रसायनों का विवेकपूर्ण उपयोग करना, जोखिम कम करना और किसान की आय को स्थिर बनाना भी होना चाहिए।

वैश्विक व्यापार में भारत की संभावनाएं

कपास का वैश्विक व्यापार अनेक देशों की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। उत्पादन, मौसम, मांग, कीमत, व्यापार नीतियां और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां इसके बाजार को प्रभावित करती हैं। ऐसे में भारत के सामने चुनौती भी है और अवसर भी। भारत के पास कपास उत्पादन के साथ-साथ कताई, बुनाई, परिधान निर्माण और हस्तकरघा की पूरी श्रृंखला मौजूद है। यदि इस क्षमता का बेहतर उपयोग किया जाए तो भारत कच्चे कपास या सूत के साथ उच्च मूल्य वाले तैयार उत्पादों के निर्यात को बढ़ा सकता है। गुणवत्ता, समय पर आपूर्ति, आधुनिक डिजाइन, पर्यावरणीय मानकों और वैश्विक बाजार की बदलती जरूरतों के अनुरूप उत्पादन भारत को प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त दे सकता है। तकनीकी वस्त्रों और विशेष उपयोग वाले कपड़ों में भी नए अवसर विकसित हो रहे हैं।

कपास और परिपत्र अर्थव्यवस्था

कपड़ा उद्योग के विस्तार के साथ कपड़ा कचरा भी एक महत्वपूर्ण पर्यावरणीय चुनौती बन रहा है। पुराने कपड़ों और उत्पादन प्रक्रिया से निकलने वाले अपशिष्ट का पुनर्चक्रण करके संसाधनों की बचत की जा सकती है। रिसाइकिल्ड कॉटन, कपड़ा अपशिष्ट से नए उत्पाद और कपास के अन्य अवशेषों का उपयोग परिपत्र अर्थव्यवस्था की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं। कपास के बीज से तेल और खली तथा डंठल के विभिन्न उपयोग भी अतिरिक्त आर्थिक मूल्य पैदा कर सकते हैं। इस प्रकार कपास का प्रत्येक हिस्सा उपयोगी बनाया जाए तो अपशिष्ट कम करने के साथ किसानों और उद्योग के लिए अतिरिक्त आय के अवसर भी पैदा किए जा सकते हैं।

अनुसंधान और नवाचार की आवश्यकता

भविष्य की कपास अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए कृषि अनुसंधान और औद्योगिक नवाचार पर निरंतर निवेश जरूरी है। कम पानी में बेहतर उत्पादन देने वाली किस्में, जलवायु परिवर्तन के प्रति सहनशील पौधे, कीट एवं रोग प्रतिरोधी विकल्प और बेहतर फाइबर गुणवत्ता पर अनुसंधान महत्वपूर्ण है। इसके साथ ही कपास के नए औद्योगिक उपयोग तलाशने की आवश्यकता है। तकनीकी वस्त्र, जैव-आधारित उत्पाद और पर्यावरण-अनुकूल सामग्री के क्षेत्र में कपास की नई संभावनाएं विकसित की जा सकती हैं। कृषि विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों, उद्योग और किसानों के बीच मजबूत सहयोग से प्रयोगशाला में विकसित तकनीक को खेत तक पहुंचाना आसान होगा। शोध तभी सार्थक होगा, जब उसका लाभ अंतिम रूप से किसान और उपभोक्ता दोनों तक पहुंचे।

किसानों के लिए मूल्य वर्धन सबसे जरूरी

कपास की पूरी अर्थव्यवस्था में सबसे महत्वपूर्ण कड़ी किसान है। इसलिए विकास का केंद्र किसान की आय और उसकी आर्थिक सुरक्षा होनी चाहिए। केवल उत्पादन बढ़ाने से किसान की स्थिति नहीं बदलती, जब तक उसे बाजार में उचित मूल्य और जोखिम से सुरक्षा न मिले। किसान उत्पादक संगठनों, सहकारी संस्थाओं, स्थानीय प्रसंस्करण इकाइयों और डिजिटल बाजारों के माध्यम से किसानों को मूल्य शृंखला से सीधे जोड़ा जा सकता है। यदि गांव के आसपास जिनिंग, प्राथमिक प्रसंस्करण और भंडारण की सुविधाएं उपलब्ध हों तो परिवहन लागत कम हो सकती है और किसानों की सौदेबाजी क्षमता बढ़ सकती है। कपास के भविष्य की सबसे बड़ी कसौटी यही होगी कि उसकी बढ़ती वैश्विक मांग का लाभ खेत तक कितना पहुंचता है।

समन्वित दृष्टिकोण आवश्यक

कपास क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए एक समन्वित दृष्टिकोण आवश्यक है। खेती में जल दक्षता और वैज्ञानिक तकनीक, बाजार में पारदर्शिता, उद्योग में आधुनिकता, श्रमिकों के लिए बेहतर परिस्थितियां, महिलाओं के लिए अवसर और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी इन सभी को एक साथ आगे बढ़ाना होगा। ग्रामीण क्षेत्रों में कपास आधारित उद्योगों का विस्तार स्थानीय रोजगार बढ़ा सकता है। महिलाओं और युवाओं को कौशल प्रशिक्षण देकर उन्हें उत्पादन और उद्यमिता से जोड़ा जा सकता है। डिजिटल प्लेटफॉर्म छोटे उत्पादकों को बड़े बाजारों तक पहुंच दे सकते हैं। वहीं टिकाऊ और जैविक कपास भारत को पर्यावरण-सचेत वैश्विक बाजार में नई पहचान दिला सकता है। कपास को केवल कृषि उत्पाद मानने के बजाय एक व्यापक आर्थिक और सामाजिक मूल्य शृंखला के रूप में देखने की जरूरत है। तभी ‘खेत से फैशन तक’ की पूरी यात्रा अधिक समावेशी और टिकाऊ बन सकेगी।

खेत, श्रम और उद्योग से आत्मनिर्भर भारत तक

कपास की सफेद फाहियां देखने में जितनी कोमल हैं, उनके पीछे जुड़ी आर्थिक और सामाजिक दुनिया उतनी ही व्यापक है। खेत में खड़ा कपास किसान के परिश्रम का प्रतीक है, चरखे पर काता गया सूत श्रम की गरिमा का, करघे पर बुना कपड़ा भारतीय कौशल का और बाजार में पहुंचा सूती उत्पाद देश की आर्थिक क्षमता का परिचायक है। विश्व कपास दिवस हमें इस पूरी यात्रा को नए दृष्टिकोण से देखने का अवसर देता है। कपास किसान की आजीविका से लेकर महिला सशक्तिकरण, ग्रामीण रोजगार, वस्त्र उद्योग, निर्यात और सांस्कृतिक विरासत तक अनेक क्षेत्रों को जोड़ता है। लेकिन इसका भविष्य तभी सुरक्षित होगा, जब उत्पादन के साथ प्रकृति का संरक्षण और आर्थिक विकास के साथ सामाजिक न्याय को भी महत्व दिया जाए। जलवायु परिवर्तन, जल संकट, उत्पादन लागत और वैश्विक प्रतिस्पर्धा जैसी चुनौतियों के बीच भारत के लिए टिकाऊ और तकनीक आधारित कपास उत्पादन की दिशा में आगे बढ़ना जरूरी है।

किसानों को बेहतर तकनीक और बाजार, श्रमिकों को सम्मानजनक रोजगार, महिलाओं को समान अवसर और उद्योग को नवाचार की शक्ति देकर कपास की पूरी मूल्य शृंखला को अधिक मजबूत बनाया जा सकता है। कपास का वास्तविक अर्थ केवल वस्त्र नहीं है। यह किसान के खेत से परिवार की आय, महिला के श्रम से आत्मनिर्भरता, बुनकर के कौशल से संस्कृति और उद्योग की क्षमता से राष्ट्र की अर्थव्यवस्था तक पहुंचने वाली एक जीवंत आर्थिक धारा है। आवश्यकता इस बात की है कि इस श्वेत धारा को आधुनिक तकनीक, सतत कृषि और न्यायपूर्ण बाजार का सहारा मिले, ताकि कपास की हर फुहार में किसान की समृद्धि, श्रमिक की गरिमा और भारत के आत्मनिर्भर भविष्य की चमक दिखाई दे।

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