प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज नई दिल्ली में 'बृहत्तर भारत: विश्व भर में भारत के सांस्कृतिक संबंध' विषय पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन को वीडियो संदेश के माध्यम से संबोधित करेंगे।
तीन दिवसीय सम्मेलन में 50 देशों के प्रतिनिधि, राजदूत और विद्वान भारत के ऐतिहासिक और समकालीन सांस्कृतिक संबंधों पर विचार-विमर्श करने के लिए एकत्रित होंगे। चीन, जापान, मंगोलिया, नेपाल और ईरान सहित अन्य देशों के प्रतिभागी साझा सांस्कृतिक विरासत और सभ्यतागत आदान-प्रदान पर चर्चा में अपना योगदान देंगे। यह सम्मेलन बृहत्तर भारत परिषद के नाम से भी जानी जाने वाली ग्रेटर इंडिया सोसाइटी की शताब्दी के उपलक्ष्य में आयोजित किया जा रहा है, जिसकी स्थापना 14 अक्टूबर 1926 को कोलकाता में भारतीय विद्वानों की एक पीढ़ी द्वारा गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के आध्यात्मिक मार्गदर्शन में की गई थी। सम्मेलन के दौरान 'एशिया की साझा सांस्कृतिक विरासत' शीर्षक से एक प्रदर्शनी का आयोजन किया जाएगा।
इस अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में चीन, जापान, मंगोलिया, नेपाल और ईरान सहित अनेक देशों के प्रतिभागी शामिल होंगे। ये प्रतिनिधि अपने-अपने देशों और भारत के बीच विकसित हुए ऐतिहासिक संबंधों, साझा परंपराओं तथा सभ्यतागत संपर्कों पर विचार-विमर्श करेंगे। भारत का सांस्कृतिक प्रभाव प्राचीन काल से ही एशिया के अनेक देशों में देखा जाता रहा है। बौद्ध धर्म, हिंदू दर्शन, भारतीय साहित्य, कला, स्थापत्य, भाषा और आध्यात्मिक विचारों ने विभिन्न समाजों की संस्कृति को प्रभावित किया है। व्यापारिक मार्गों, यात्राओं, धार्मिक प्रचारकों और विद्वानों के माध्यम से भारत के विचारों तथा परंपराओं का प्रसार दूर-दूर तक हुआ। इसी प्रकार, अन्य सभ्यताओं के संपर्क से भारतीय संस्कृति भी समृद्ध हुई है। सम्मेलन में इन पारस्परिक संबंधों के ऐतिहासिक स्वरूप और वर्तमान समय में उनकी प्रासंगिकता पर चर्चा की जाएगी।
यह आयोजन ग्रेटर इंडिया सोसाइटी, जिसे बृहत्तर भारत परिषद के नाम से भी जाना जाता है, की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में किया जा रहा है। इस संस्था की स्थापना 14 अक्टूबर 1926 को कोलकाता में भारतीय विद्वानों की एक पीढ़ी द्वारा गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के आध्यात्मिक मार्गदर्शन में की गई थी। संस्था का उद्देश्य भारत की सांस्कृतिक उपलब्धियों, एशियाई देशों के साथ उसके ऐतिहासिक संबंधों और साझा सभ्यतागत विरासत के अध्ययन को प्रोत्साहित करना रहा है। इसकी शताब्दी का आयोजन भारतीय सांस्कृतिक इतिहास के अध्ययन और अंतर्राष्ट्रीय संवाद को नई दिशा देने का अवसर प्रदान करता है।

















