नई दिल्ली: अंतरिक्ष काला क्यों दिखाई देता है, यह
सवाल सदियों से वैज्ञानिकों और जिज्ञासु लोगों को आकर्षित करता रहा है। इस विषय पर
कई वैज्ञानिकों ने गहराई से अध्ययन किया। आज विज्ञान इस रहस्य को काफी हद तक समझा
चुका है। सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि पृथ्वी पर दिन के समय आकाश नीला क्यों
दिखता है। दरअसल, सूर्य से आने वाली रोशनी जब पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करती है,
तो
वहां मौजूद गैसों और कणों से टकराकर अलग-अलग दिशाओं में बिखर जाती है। इस प्रक्रिया
को रेले प्रकीर्णन कहा जाता है। नीली रोशनी का बिखराव अधिक होता है, इसलिए
हमें आकाश नीला नजर आता है।
वहीं, रात के समय स्थिति बदल जाती है। जब पृथ्वी का हिस्सा सूर्य की रोशनी
से दूर होता है, तो प्रकाश का बिखराव नहीं हो पाता और आकाश काला दिखाई देता है। अगर
कोई व्यक्ति चंद्रमा जैसे स्थान पर जाए, जहां वायुमंडल नहीं है, तो
वहां दिन में भी आकाश काला ही दिखाई देगा।
ऐसा इसलिए क्योंकि वहां प्रकाश को बिखेरने के लिए कोई माध्यम मौजूद
नहीं होता। अब सबसे अहम सवाल उठता है कि जब ब्रह्मांड में सूर्य व असंख्य तारे
मौजूद हैं, तो उनका प्रकाश मिलकर पूरे आकाश को रोशनी क्यों नहीं देता? इसी
पहेली को ओल्बर्स का विरोधाभास कहा जाता है। सामान्य तौर पर यह उम्मीद की जाती है
कि यदि ब्रह्मांड अनंत और हमेशा से मौजूद होता, तो हर दिशा में
हमें तारे दिखाई देते और रात का आकाश चमकदार होता।
वैज्ञानिकों के अनुसार इस विरोधाभास का समाधान ब्रह्मांड की उम्र और
विस्तार में छिपा है। माना जाता है कि ब्रह्मांड लगभग 13 से 15 अरब
वर्ष पुराना है। इसका मतलब यह है कि हम केवल उतनी ही दूरी तक देख सकते हैं,
जितनी
दूर तक प्रकाश इस समय में यात्रा कर पाया है। जो तारे और आकाशगंगाएं इससे भी अधिक
दूर हैं, उनकी रोशनी अभी तक हम तक पहुंची ही नहीं है। इसके अलावा, एक
और महत्वपूर्ण कारण ब्रह्मांड का लगातार फैलना है। जब कोई तारा या आकाशगंगा हमसे
दूर जाती है, तो उसके प्रकाश की तरंगदैर्ध्य बढ़ जाती है। इस प्रभाव को डॉप्लर प्रभाव
कहा जाता है।
इस प्रक्रिया में प्रकाश लाल रंग की ओर खिसक जाता है और कई बार इतना
कमजोर हो जाता है कि हमारी आंखों से दिखाई ही नहीं देता। हालांकि, अंतरिक्ष
पूरी तरह से काला नहीं है। बहुत दूर स्थित तारों और आकाशगंगाओं से आने वाली हल्की
रोशनी अंतरिक्ष में एक धुंधली चमक पैदा करती है। पृथ्वी के वायुमंडल से बाहर यह
अंधकार और भी गहरा प्रतीत होता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, आकाश के रंग और
प्रकाश का व्यवहार वायुमंडल की संरचना पर भी निर्भर करता है।
यदि वायुमंडल हाइड्रोजन से भरपूर और फैला हुआ हो, तो
नीली रोशनी ज्यादा बिखरती है। वहीं यदि वायुमंडल घना या बादलों से ढका हो, तो
सभी रंगों का बिखराव लगभग समान होता है।















