भारत की सभ्यतागत यात्रा सांस्कृतिक आदान-प्रदान की कहानी रही है: प्रधानमंत्री मोदी


देश 15 October 2026
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भारत की सभ्यतागत यात्रा सांस्कृतिक आदान-प्रदान की कहानी रही है: प्रधानमंत्री मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को कहा कि भारत की सभ्यतागत यात्रा सदियों से सांस्कृतिक आदान-प्रदान की कहानी रही है, जिसमें नालंदा जैसे शिक्षण केंद्रों ने पूरे एशिया में ज्ञान के आदान-प्रदान को सुगम बनाया और बौद्ध भिक्षुओं, विद्वानों, व्यापारियों और यात्रियों ने भूमि और समुद्री मार्गों के माध्यम से भारतीय विचारों को दुनिया के विभिन्न हिस्सों में पहुंचाया।

नई दिल्ली के विज्ञान भवन में 14 से 16 अक्टूबर तक आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन 'भारत के वैश्विक सांस्कृतिक संबंध' में अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने कहा कि यह सांस्कृतिक संवाद निरंतर फलता-फूलता रहता है, जिसके माध्यम से भारतीय दर्शन, संगीत, नृत्य, साहित्य, सिनेमा और पाक परंपराएं विश्व भर के समाजों को भारत से जोड़ती हैं। संस्कृति मंत्रालय द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, उन्होंने आगे कहा कि विभिन्न देशों में भारतीय त्योहारों और परंपराओं का उत्सव और योग का वैश्विक प्रसार यह दर्शाता है कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपराएं किस प्रकार विभिन्न संस्कृतियों के लोगों को आपस में जोड़ती रहती हैं।

सम्मेलन ने ग्रेटर इंडिया सोसाइटी की शताब्दी मनाई

प्रधानमंत्री ने सम्मेलन का आयोजन करने वाले संस्कृति मंत्रालय और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईएनजीसीए) को अपनी शुभकामनाएं दीं और भारत और विदेश से आए विद्वानों, शोधकर्ताओं, राजनयिकों और अन्य विशिष्ट प्रतिभागियों का स्वागत किया।

भारत की सांस्कृतिक विरासत को मिल रही वैश्विक मान्यता को देखते हुए, प्रधानमंत्री मोदी ने ग्रेटर इंडिया सोसाइटी की शताब्दी के उपलक्ष्य में आयोजित इस सम्मेलन के महत्व पर प्रकाश डाला। ग्रेटर इंडिया सोसाइटी ने एशिया और विश्व के अन्य भागों के साथ भारत के सांस्कृतिक और बौद्धिक संबंधों के अध्ययन और समझ को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि विचार-विमर्श से विश्व के साथ भारत के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों की समझ गहरी होगी और अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक सहयोग मजबूत होगा।

प्रधानमंत्री का संदेश संस्कृति मंत्रालय के सचिव विवेक अग्रवाल ने पढ़ा, जिन्होंने प्रारंभिक भाषण भी दिया।

संस्कृति को दुनिया को जोड़ना चाहिए, न कि विभाजित करना चाहिए: शेखावत

 सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए केंद्रीय संस्कृति और पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि बृहत्तर भारत सम्मेलन इस बात का पता लगाने का अवसर प्रदान करता है कि कैसे अतीत का ज्ञान भविष्य का मार्गदर्शन कर सकता है और कैसे सांस्कृतिक आदान-प्रदान ने सभ्यताओं को विचारों, ज्ञान और कलात्मक परंपराओं को साझा करने में सक्षम बनाया है।

उन्होंने कहा कि 14 अक्टूबर, 1926 को कलकत्ता में स्थापित ग्रेटर इंडिया सोसाइटी की शताब्दी के उपलक्ष्य में आयोजित सम्मेलन ने विश्व के साथ भारत के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों के अध्ययन के महत्व को पुनः स्थापित किया।

शेखावत ने इस बात पर जोर दिया कि बृहत्तर भारत को किसी राजनीतिक या क्षेत्रीय दावे के रूप में नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों के व्यापक दायरे के रूप में समझा जाना चाहिए। उन्होंने वसुधैव कुटुंबकम के भारतीय सभ्यतागत सिद्धांत को दोहराते हुए कहा कि यह आपसी सम्मान और साझा जिम्मेदारी का एक स्थायी संदेश देता है।

उन्होंने कहा, "संस्कृति को दुनिया को जोड़ना चाहिए, न कि विभाजित करना चाहिए," इस बात पर जोर देते हुए कि सांस्कृतिक आदान-प्रदान और साक्ष्य-आधारित अनुसंधान समझ को बढ़ावा दे सकते हैं और संवाद को बनाए रख सकते हैं, भले ही राजनीतिक संबंध कठिन हो जाएं या भाषा संबंधी बाधाएं उत्पन्न हों।

उन्होंने भारत के वैश्विक सांस्कृतिक संबंधों के अध्ययन को अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर आधारित एक गतिशील और साक्ष्य-आधारित क्षेत्र के रूप में विकसित करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि बृहत्तर भारत एक ऐसा मंच बनना चाहिए जहां साझा विरासत संयुक्त अनुसंधान को प्रेरित करे, आपसी समझ को मजबूत करे और स्थायी अंतरराष्ट्रीय साझेदारी का निर्माण करे।

उन्होंने आगे कहा कि यह सम्मेलन न केवल एक महत्वपूर्ण विद्वतापूर्ण प्रयास का स्मरणोत्सव होना चाहिए, बल्कि मानवता को एकजुट करने वाले सांस्कृतिक संबंधों का अध्ययन, संरक्षण और आदान-प्रदान करने के लिए एक नए अंतरराष्ट्रीय आंदोलन की शुरुआत का भी प्रतीक होना चाहिए।

बृहत्तर भारत परियोजना का उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान को बढ़ावा देना है।

 विवेक अग्रवाल ने इस बात पर प्रकाश डाला कि बृहत्तर भारत परियोजना का उद्देश्य लगभग 51 देशों के विद्वानों को शामिल करते हुए सहयोगात्मक, साक्ष्य-आधारित अनुसंधान के माध्यम से भारत के प्राचीन सांस्कृतिक संबंधों को विश्व के साथ अंतरराष्ट्रीय मान्यता दिलाना है।

ग्रेटर इंडिया सोसाइटी की शताब्दी के उपलक्ष्य में शुरू की गई इस परियोजना का उद्देश्य संयुक्त अनुसंधान, संगोष्ठी और कार्यशालाओं के माध्यम से वैश्विक ज्ञान प्रणालियों, भाषाओं, विज्ञान, कला और सांस्कृतिक परंपराओं में भारत के योगदान का पता लगाना है। इसमें अंतरराष्ट्रीय अकादमिक आदान-प्रदान के लिए एक सुनियोजित पांच वर्षीय कार्यसूची की परिकल्पना भी की गई है और यूनेस्को की प्रतिनिधि सूची में साझा अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के बहुराष्ट्रीय नामांकन की संभावनाओं का पता लगाने का प्रयास किया गया है।

बृहत्तर भारत को एक संयुक्त विद्वत्तापूर्ण प्रयास बताते हुए अग्रवाल ने कहा कि इस पहल का उद्देश्य साझा विरासत की गहरी समझ विकसित करना और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को मजबूत करना है। शैक्षणिक सहयोग और सांस्कृतिक संवाद को बढ़ावा देकर, यह परियोजना वसुधैव कुटुंबकम के सिद्धांत पर आधारित शांति, एकता और साझा समृद्धि को आगे बढ़ाने का लक्ष्य रखती है।

IGNCA ने साझा सांस्कृतिक विरासत पर प्रकाश डाला

 अपने स्वागत भाषण में, आईएनजीसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि सभ्यताओं की पहचान केवल भौगोलिक सीमाओं से ही नहीं, बल्कि विचारों और लोगों के आवागमन और उनके द्वारा छोड़ी गई यादों से भी आकार लेती है।

इतिहास में, व्यापारियों ने पहाड़ों और समुद्रों को पार किया, बौद्ध भिक्षुओं और तीर्थयात्रियों ने पवित्र स्थलों की यात्रा की, विद्वानों ने विचारों का आदान-प्रदान किया और ग्रंथों का अनुवाद किया, और कारीगरों ने अपने कौशल और कलात्मक परंपराओं को विभिन्न क्षेत्रों में फैलाया। उन्होंने कहा कि इन आदान-प्रदानों ने संस्कृतियों को संवाद स्थापित करने, एक-दूसरे से सीखने और विकसित होने में सक्षम बनाया, जिससे ऐसे संबंध बने जो आज भी दुनिया को आकार दे रहे हैं। बृहत्तर भारत की अवधारणा सांस्कृतिक आदान-प्रदान के इसी इतिहास में निहित है।

जोशी ने बताया कि बृहत्तर भारत संस्कृति मंत्रालय के आईसीआर प्रभाग की एक पहल है, जिसे आईएनजीसीए द्वारा कार्यान्वित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य भारतीय सभ्यता और चयनित देशों की साझा सांस्कृतिक विरासत की पहचान करना, उसका दस्तावेजीकरण करना, उसे संरक्षित करना और उसे सुलभ बनाना है। यह पहल भौगोलिक और राजनीतिक सीमाओं से परे जाकर विभिन्न राष्ट्रों के लोगों के बीच ऐतिहासिक संबंधों और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का पता लगाने का प्रयास करती है।

प्रदर्शनी एशिया की साझा सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित करती है

सम्मेलन के अंतर्गत 'एशिया की साझा सांस्कृतिक विरासत' शीर्षक से एक प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। शेखावत, अग्रवाल और अन्य विशिष्ट अतिथियों ने प्रदर्शनी का दौरा किया, जिसमें भारत और अन्य एशियाई देशों के बीच साझा विरासत और ऐतिहासिक सांस्कृतिक संबंधों को प्रदर्शित किया गया।

संस्कृति मंत्रालय के संयुक्त सचिव डॉ. अरविंद कुमार ने धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत किया। इस अवसर पर आईएनजीसीए में बृहत्तर भारत प्रभाग के प्रमुख प्रोफेसर धर्म चंद चौबे भी उपस्थित थे।

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